ज़िन्दगी में बहुत कुछ सीखने का अवसर बड़े लोगों को देखकर भी मिलता है। मैं इस लेख में दो तस्वीरों के बारे में बात करूंगा। पहली तस्वीर पिछले वर्ष की है जब छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माता का देहांत हुआ था।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के भिलाई 3 स्थित घर पर उनकी माता की शोकसभा आयोजित हुई थी जिसमें शामिल होने के लिए मैं दिल्ली से वहां पहुंचा था। वहां छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी अपने परिवार के सदस्यों के साथ आए थे। मेरे सम्बन्ध दोनों परिवार से रहे हैं।
मैंने वहां दोनों नेताओं को एक-दूसरे का बेहद सम्मान करते हुए देखा। जोगी को मुख्यमंत्री से उनकी माता के संदर्भ में बहुत भावुक तरीके से बात करते हुए मैंने बहुत करीब से देखा। मैं मुख्यमंत्री के बिल्कुल करीब ही बैठा था।दोनों नेताओं का एक-दूसरे के लिए स्नेह, अपार आदर और श्रद्धा देखकर लगा कि हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता यही है।
वहां मौजूद विभिन्न दलों के नेता व कार्यकर्ता और मीडिया कर्मी दोनों नेताओं के भाव को टकटकी लगाकर देख रहे थे। चूंकि दोनों को छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक-दूसरे के विपरीत माना जाता रहा है लेकिन जोगी और भूपेश की एक-दूसरे के लिए सम्मान, भावना, अंदाज़ और संवाद ने वर्तमान भारतीय राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की।
तीन दिन पहले (29 मई 2020) छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का देहांत हो गया। पूरा छत्तीसगढ़ ठहर सा गया। मुझे जोगी के देहांत की सूचना मिली लेकिन लॉकडाउन के कारण दिल्ली से रायपुर जाना संभव नहीं था।
इसी बीच मैंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा जोगी को दी गई श्रद्धांजलि की तस्वीर सोशल मीडिया पर देखा। उक्त तस्वीर को और मुख्यमंत्री के चेहरे के भाव को देखकर ऐसा लगा कि बड़े लोग बड़े ही होते हैं। भूपेश ने जोगी के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करते समय जो बात कही, वो बहुत भावुक होकर कही। उनके शब्दों में अटूट रिश्ते और विश्वास की गाथा थी।
भूपेश बघेल द्वारा कहे गए शब्द दिल को छू लेने वाले थे। मैंने कई बार मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जारी भूपेश की तरफ से जोगी के लिए श्रद्धांजलि में कहे शब्दों को पढ़ा। एक एक शब्द एक-दूसरे के रिश्ते और लगाव को दर्शा रहे थे।
ये दोनों बातों को मैंने विशेष रूप से इसलिए प्रस्तुत किया है ताकि नई पीढ़ी प्रेरणा लेकर राजनीति में रिश्तों के निर्वाह को समझे।
राजनीति में किसी दल, नेता और विचारधारा से असहमति हो सकती है। कभी-कभी एक ही दल में रहकर भी दूरी हो जाती है और कई बार अलग राह, अलग दल और अलग विचार भी हो जाते हैं फिर भी निजी रिश्ते बरकरार रहते हैं।
मैंने अपने गुरु, आदर्श और नेता भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर को ऐसा करते कई बार देखा था वे तो रिश्तों के निर्वाह के लिए ही जाने जाते थे।
आज राजनीति का स्तर गिर रहा है। ऐसे में सभी दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं, समर्थकों को राजनीति असहमति के बावजूद निजी रिश्तों के निर्वाह को प्राथमिकता देना चाहिए।
भूपेश बघेल और अजीत जोगी का उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि हमारी युवा पीढ़ी इन दोनों नेताओं की कार्य शैली को आत्मसात कर सके।
संपादन: परवेज़ अनवर
न्यूज़ डायरेक्टर और एडिटर- इन-चीफ, आई बी टी एन मीडिया नेटवर्क ग्रुप, नई दिल्ली
लेखक: सादात अनवर
चन्द्रशेखर स्कूल आफ पॉलिटिक्स, नई दिल्ली
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